Thursday, October 23, 2008
ताज को देखकर
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ताज को देखकर मृत्यु प्यार के ढाई आखर के ही बराबर डूबकर जिसमें पाया जा सकता सौंदर्य, शिव, सत्य ----- उजली पांखों को झटक, फेंक दी हंस ने एक अद...
चिंतन
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चिंतन बीज ने छोड़ा केंचुल तन गया बनकर अंकुर मानो दीर्घतपी सा एक पैरों पर खड़ा जीवन और मृत्यु पर कर रहा चिंतन
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कविता
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कविता आदमी के जिंदापन का सबूत अंधेरे सूनेपन में उजली सी धूप उद्दाम यौवन की मिष्ठातिक्त स्वाद बूढ़े मन की गदराई याद नहीं केवल शब्द अर्थों के ...
नदी
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नदी पकी हुई बालियों को देख सूख रही नदी ने किया महसूस अब भी उफान पूरे जोरों पर है 00 नहीं चाहती गंदला होना यह तो नियति है उसकी कि उठान से झला...
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Monday, October 13, 2008
ढेला
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ढेला -क्या नाम है तुम्हारा? -ढेला -कहां रहती हो? - नहीं पहचान रहे हो मुझे? -पहचानता तो क्यों पूछता? -यहीं तो रहती हूं, कृपा की लड़की हूं। -अच...
तमीज
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तमीज बदली गई है आज गमले की मिट्टी जड़ों को कांट-छांट। पौधा हरिया रहा अब भी बौनापन लिए खुश हैं कि मिट्टी कितना कर देती है। फूल खिलेगा पर बौनाप...
अंधविश्वास
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अंधविश्वास सुबह हर रोज टिफिन कैरियर को साइकिल में रखकर निहारती रहती है तब तक जब तक आंखों से ओझल न हो जाए उसका साइकिल सवार। शाम हर रोज तुलसी ...
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