आसमान बस कुछ ही कदम हमसे दूर था

4:03 PM, Posted by डा. निर्मल साहू, No Comment

आसमान बस कुछ ही कदम हमसे दूर था। सूरज ऐसा लग रह था मानो लाल गेंद हो। हनुमान द्वारा सूरज को कोई फल समझकर मुंह में भर लेने की कथा बरबस ही मेरी स्मृति पटल पर उभर आई। सूरज की पूरी उर्जा मानो यहां आकर शांत हो जाती हो। हम दार्जिंलिंग में, मई की भरी गर्मी में ठिठुर रहे थे।

30 अप्रैल को हमने माना विमानतल से कलकत्ता के लिए एयर डेक्कन के विमान से रवाना हुए। पहली बार मैं घर से दूर इतनी दूरी की लंबी यात्रा पर निकली थी। पहली बार विमान में बैठने का सुयोग मिला था। रोमांच, डर, उत्सुकता और न जाने क्या कुछ मन में समाया हुआ था। हमारे दोनों बच्चे आयु और पियुष तो न जाने कितने दिनों से विमान के सफर की बातें किया करते थे।
एक दिन पहले पहुंचे मेरे पति के मित्र रामनारायण व्यास कलकत्ता में अपने परिवार के साथ इंतजार कर रहे थे लेकिन रायपुर में विमान ने लगभग दो घंटे देरी से उड़ान भड़ी और हमारे वहां पहुंचते तक छूट गया। मित्र के परिजन जो उन्हें वहां छोड़ने आए थे वे हमारा वहां इंतजार कर रहे थे। हम जब पहुंचे तो उन्होंने मित्र के रवाना होने की जानकारी दी। उन्होंने हमारे लिए भोजन का पैकेट भी तैयार कर रखा था। उन्होंने तुरंत हमारे लिए बस की व्यवस्था की। उनकी व्यवस्था करते तक हमने स्टेशन में उनके द्वारा लाया गया भोजन भी कर लिया। हम यहां से एक एरकंडीशन बस से रात साढ़े 11 बजे हम कलकत्ता से सिलीगुड़ी के लिए रवाना हुए।
बस की खिड़की से पति विवेक भोई के साथ दार्जिलिंग की हसीन वादियों का नजारा अपने दिल में कैद करते मेरा मन बार-बार यही कह रहा था अच्छा हुआ ट्रेन छूट गई। नहीं तो ऐसे मनोरम नजारे को देखने का मौका इतनी करीब से कैसे मिलता। ऊंची निची पहाड़ियों घाटियों तंग संकरी सड़कों से गुजरती हिचकोलें खाती हमारी बस अपने गंतब्य की ओर अग्रसर हो रही थी।
उधर मेरे दोनों बच्चे आयुष और पियूष बार-बार पूछने लगे थे कि हम कब पहुंचेंगे। 12 घंटे की सफर तय करने के बाद बस सिलीगुड़ी पहुंची। सिलीगुड़ी में रामनारायण व्यास, उनकी पत्नी हेमा व्यास, दोनों बच्चे दिव्यांस और राघव बेसब्री से हमारा इंतजार कर रहे थे।

सिलिगुड़ी
सुबह 11 बजे हमारी बस सिलीगुड़ी पहुंची। यहां के एक लॉज में व्यास परिवार हमारा इंतजार कर रहा था। यहां लाज में नहा धोकर खाना खाया और सफर की थकान दूर करने पलंग में पसर गए। थोड़ी सी नींद ने हमें तरोताजा कर दिया था। अब यहां से व्यास परिवार के साथ दार्जिलिंग के लिए हम रवाना हुए।
हमने दार्जिलिंग जाने के लिए यहां से टैक्सी ली हालांकि यहां जाने के लिए ट्रेन भी उपलब्ध हैं। बरसों पुराना बाप इंजन वाली यह ट्रेन टाय ट्रेन के नाम से जानी जाती है। इस ट्रेन का मजा यदि आपके पास समय ज्यादा हो तो लिया जा सकता है लेकिन हमारे पास वक्त उतना नहीं था। पर ट्रेन को अपने ही साथ-साथ चलते देखते जाने का मजा पहली बार यहां आप ले सकते हैं। पटरी और सड़क साथ-साथ चलते हैं। कुछ इस तरह लगता है मानो पटरी और सड़क एक दूसरे से वेणी की तरह गुंथी हुई हो। पहाड़ी के कारण इस ट्रेन की गति काफी धीमी होती है। धीरे-धीरे रुककर चलती हुई ट्रेन से आप जगह-जगह उतरकर आसपास के दृश्यों का मजा ले सकते हैं।
धीरे-धीरे हमारी टैक्सी उपर बढ़ी जा रही थी। ज्यों-ज्यों हम पहाड़ियों के उपर बढ़ते जा रहे थे ठंड भी बढ़ने लगा। कहां रायपुर का तपिश से निकले हम अब ठंड की आगोश में थे। उंची-उंची पाहड़ियां, संकरे मार्ग, टेढ़े-मेढ़े रास्ते साथ-साथ गुजरती ट्रेन की पटरी, नीचे गहरी खाई। ड्राइवर की हल्की सी लापरवाही मौत के मुंह में ला खड़ा कर दे। मन यहां आते-आते थोड़ा सा दार्शनिक होने लग गया था। टैक्सी ड्राइवराें और ट्रेन चालक का आपसी समन्वय देखकर लगा कि दोनों के रास्ते एक हैं, मंजिल एक, पर संसाधन रुप से अलग-अलग पर होते हुए भी कितने सजग और सुचारू हैं। कहीं-कोई गलतफहमी, चूक की गुंजाइश नहीं। दाम्पत्य जीवन भी तो इसी तरह है। लुभावने चाय के बागानों को मैंने फिल्मों में देखा था पर रास्ते भर फैले इन बागानों को देख उसकी ताजगी यहां आकर महसूस करने को मिली।


टाइगर हिल
अब हम थे टाइगर हिल में। हवा में लाल गेंद की तरह लटका सूरज। ऐसा लगा मानों हम आसमान से कुछ कदम ही दूर हैं। हनुमान द्वारा सूरज को कोई फल समझकर मुंह में भर लेने की कथा बरबस ही मेरी स्मृति पटल पर उभर आई। सूरज की पूरी उर्जा मानो यहां आकर शांत सी हो जाती हो। दार्जिलिंग में हम चाय के बागानों में गए। चिड़ियाघर, संग्राहलय, बौध्द मंदिर, रॉक गार्डन, मिरीक झील देखा। सब कुछ अनुपम, सब कुछ सबसे अलग हटकर, क्या कह,ूं क्या लिखूं , शब्द भी पकड़ में नहीं आ रहे। हर शब्द अपने वजन में कमतर और छोटा पड़ने लगा। बच्चों ने तो रॉक गार्डन में खूब मजे किए।
गंगटोक
अब हमारा लक्ष्य था सिक्किम की राजधानी गंगटोक। दार्जिलिंग से यहां जाने के लिए 140 किलोमीटर का सफर सड़क मार्ग से तय करना पड़ता है। 11 किलोमीटर तक साथ-साथ चलती है चंचला तिस्ता नदी। 11 किलोमीटर के इस फासले को हमने राफ्टिंग से तय किया। राफ्टिंग के इस रोमांचपूर्ण सफर ने तन-मन में एक नई उर्जा भर दी थी।
इसके बाद हम आगे के लिए रवाना हुए। पहाड़ों से गुजरते कल-कल करते झरने, फूल पौधों से लदी धरती को देख लगा मानो स्वर्ग का एक हिस्सा यहीं पर आकर ठहर गया हो। नाना परिधानों से सजी प्रकृति के इस रुप को निहारते जब हम सिक्किम पहुंचे तो शाम के 6 बज गए थे। गंगटोक में शाम 5 बजे से रात 9 बजे तक टैक्सी के प्रवेश पर प्रतिबंध है हम टैक्सी स्टैंड से पैदल ही लॉज पहुंचे। यहां सस्ते से लेकर महंगे लॉज भी उपलब्ध हैं। आप अपनी आय और जरूरत के हिसाब चुनाव कर सकते हैं।
गंगटोक में सबसे अच्छी बात यहां पर पालीथीन पर लगा प्रतिबंध लगा। यहां पालीथीन का उपयोग करते पकड़े जाने पर जुर्माना देना पड़ता है। लगा काश हमारे छत्तीसगढ़ में भी ऐसा कानून लागू होता तो देश का सबसे गंदा शहर का खिताब मिलने से रायपुर को नवाजा तो नहीं जाता। सुबह होते ही हम सबसे पहले बौध्द मंदिर गए फिर बौध्द संग्रहालय देखा, फिर जूलोजिकल गार्डन।
रोप वे से गंगटोक का नजारा अपने आप में अलग अनुभव रहा। हरेभरे पहाड़, सीढ़ीनुमा खेत सर्पाकार सड़कें और उन पर दौड़ी टैक्सियां मन के हर कोने को छू गईं। आपके पास पैसे हो तों आप किराए में हेलीकॉप्टर भी ले सकते हैं। दिनभर आसपास के अन्य कई जगहों को देखा कुछ खरीददारी की।

यूमथांग
हमारा अगला पड़ाव था यूमथांग। गंगटोक से 28 किलोमीटर दूर समुद्रतल से 12 हजार पीट की उंचाई पर स्थित । रास्ते भर लाल और सफेद आर्किड फूल मानो आपका कोई गुलदस्ता लेकर स्वागत कर रहा हो। पहाड़ाें में बिछी बर्फ की चादर जैसे शिव भस्म लगाए समाधि में लीन हाें। टैक्सी के चालक ने बताया कि ये फूल अपने आप लगते हैं इसे लगाया नहीं गया है।
यूमथांग से पहाड़ों का सफर 16 किलोमीटर तय करना पड़ता है। यहां का मौसम बच्चों सा है, एकदम नाजुक। पल भरमें बदली और फिर बारिश। सूरज की किरणें यहां मानो पतली हो जाती हैं। यहां हम सबने बर्फ का खूब मजा लिया। बच्चे तो घरौंदे बनाने और एक दूसरे पर बर्फ फेंकने में जुट से गए थे। आसानी से स्केटिंग करते लोगों को देखकर ऐसा लगा मानव ने प्रकृति के हर रुप का उपभोग अपने तरीके से करना सीख लिया है। दिन भर यहां मौ- मस्ती करने के बाद हमने रात लॉज में बिताई। यहां रहने और खाने के लिए पैकेज की व्यवस्था है। यहां लॉज में कंबल ही नहीं स्वेटर तक किराए में उपलब्ध हो जाते हैं यह जानकर हमें इस बात पर अफसोस हुआ कि हमने आने से पहले इस तरह की छोटी-छोटी जानकारियां क्यों इकट्ठी नहीं कर लीं। रायपुर से गरम कपड़े इतने लाए थे कि एक सूटकेस तो उसी का था।

नाथु ला और बाबा मंदिर
अब हम अगले दिन निकल पड़े नाथु ला के लिए। गंगटोक से इसकी दूरी है 168 किलोमीटर। रास्ता बहुत ही खतरनाक, मौत जैसे हर पल किसी का इंतजार कर रही हो। रास्ते भर किसी अनहोनी की आशंका से घिरे हम हनुमान जी को याद करते रहे। ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों से गुजरते ऐसा लग रहा था मानो बादल सिर को अब छूकर निकल जाएगा। इसी रास्ते में हमने प्रसिध्द झील मंदाकिनी को देखा।

हमारी उत्सुकता बाबा मंदिर को लेकर थी अब तक हमने अखबारों, पत्रिकाओं से इसके बारे में थोड़ा बहुत जान रखा था। आज यहां इसके साक्षात दर्शन होने जा रहे थे। बाबा मंदिर में सैनिक अधिकारी हरभजन सिंह की पूजा की जाती है। माना जाता है कि हरभजन सिंह देश के प्रति अपना फर्ज निभाते अदृश्य हो गए थे परंतु आज भी यहां उनके होने का अहसास होता है। उनके कबिन में आज बी एक मेज और एक कुर्सी रखी हुई है। उनके फोटो के सामने लिखा हुआ है- आप यहां से जाएं तो लोगों को यह बतलाएं कि मैंने अपना आज उनके कल के लिए कुर्बान कर दिया है। नाथू ला आने वाल हर सख्श इस मंदिर में जरूर आता है।
बाबा मंदिर से 9 किलोमीटर आगे है नाथू ला। बाबा मंदिर से यहां का सफर पैदल तय करना पड़ता है। टैक्सी यहीं रह जाती है। समुद्र तल से 13 हजार 200 फीट की उंचाई पर स्थित नाथुला में तापमान 0 डिग्री सेल्सियस से नीचे रहता है। बर्फीली हवाएं हमेशा चलती रहती हैं। यहां आक्सीजन की कमी के कारण सांस की तकलीफ हो जाती है। जिन्हें सांस की तकलीफ हो उन्हें इस जगह नहीं आना चाहिए। वैसे आक्सीजन साथ लेकर यहां आया जा सकता है। सामान्य व्यक्ति पापकार्न और बंद गोभी की सब्जी खाकर अपने शरीर को गर्म रख सकते हैं।
नाथू ला से चीन की सीमा लगी हुई है। इस स्थिति में भी सीमा पर देश की पहरेदारी करते जवानों को देखकर हमार सिर अनायास ही श्रद्दा और देशभक्ति से झुक जाता है। यहां चीनी सैनिकों से मिलकर बातें कीं। उनके शिष्टाचार ने हमें काफी प्रभावित किया। ऐसा लगा मानो दिल से जुड़ने के लिए सीमा कोई मायने नहीं रखती। बस प्यार ही बहुत है। चंद दिनों की अविस्मरणीय छवियों के साथ हम लौट पड़े अपनी कर्मभूमि रायपुर के लिए।
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श्रीमती नीता-विवेक भोई
महावीर नगर, रायपुर

छत्तीसगढ़: अपनी ही जमीन से बेदखल आदिवासी

4:13 PM, Posted by डा. निर्मल साहू, One Comment

छत्तीसगढ़: अपनी ही जमीन से बेदखल आदिवासी

परिचय
जिस तरह विश्व में हमारे देश का स्थान है उसी तरह स्थान अन्य प्रदेशों की तुलना में मध्यप्रदेश का था। किसी राज्य के पृथक्करण के पीछे दीर्घकालीन आर्थिक,राजनीतिक सामजिक उपेक्षा और शोषण होता है जिससे धीरे-धीरे असंतोष जन्म लेता है और यही बात छत्तीसगढ़ के निर्माण के पीछे लागू होती है। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से छत्तीसगढ क़ी प्रशासनिक दूरी अधिक होने से नीतिगत फैसलों को करने और उनके क्रियान्वयन में देरी होती थी। छत्तीसगढ़ की आबादी मालदीव,कुवैत, इराक,नेपाल वशरीलंका जैसे राष्ट्रों से भी अधिक है। छतीसगढ़ का क्षेत्रफल कई राज्यों के क्षेत्रफल से अधिक है। छत्तीसगढ़ से एकत्रित राजस्व की तुलना में छत्तीसगढ़ को विकास हेतु पर्याप्त धन नहीं दिया जाता था? जबकि अकेले बस्तर जिले से सालाना 120 करोड़ रुपए का राजस्व प्राप्त होता था और उसे विकास के लिए महज 5 करोड़ रुपए दिए जाते थे। छत्तीसगढ अंचल से सदैव ही भेदभाव किया जाता रहा उच्च न्यायालय व उच्च न्यायालय की खंडपीठ, राजस्वमंडल, परिवहन आयुक्त, आबकारी आयुक्त, महालेखाकार, भूराजस्व, विद्युत मंडल, वित्त निगम आदि प्रमुख कार्यालय भोपाल और जबलपुर में स्थापित किए गए। यहां का विकास तो केवल क्षेत्रीय खनिज संपदा के दोहन तक सीमित होकर रह गया था। वहीं छत्तीसगढ़ अपनी भाषा,रहन,सहन व विशिष्ट संस्कृति से शेष मध्यप्रदेश से अलग था।

देश के इस सबसे बड़े राज्य अविभाजित मध्यप्रदेश के विभाजन के पीछे प्रमुख कारण यह था कि दूरस्थ अंचलों तक विकास का उजाला पहुंच सके, सबका विकास हो सके सबको सहजता से न्याय मिल सके। हर खेत तक पानी, हर हाथ को काम, हर बच्चे को दूध मिल सके, कोई भी आदमी भूखा या नंगा ना रहे को साकार करने के लिए छत्तीसगढ़ अंचल को पृथक राज्य बनाया गया।
अगस्त 2000 में संसद के दोनों सदनों ने राज्य का पुनर्गठन विधेयक पारित कर दिया, यह विधेयक लोकसभा में 31 जुलाई को तथा राज्य सभा में 9 अगस्त 2000 को पारित किया गया। महामहिम राष्ट्रपति ने 28 अगस्त 2000 को अपनी मंजूरी दे दी। 1 नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ भारत के 26 वें राज्य के रुप में अस्तित्व में आ गया।

प्रशासनिक विभाजन
135,191 वर्ग किलोमीटर में फैले छत्तीसगढ़ राज्य को प्रशासनिक दृष्टि से तीन संभागों रायपुर, बस्तर तथा बिलासपुर और 16 जिलों में विभक्त किया गया है। रायपुर संभाग के अंतर्गत 6 जिले रायपुर,महासमुंद,धमतरी, दुर्ग, राजनांदगांव,कवर्धा हैं। बस्तर संभाग के अंतर्गत 3 जिले बस्तर, दंतेवाड़ा, और कांकेर है। बिलासपुर संभाग में 7 जिले क्रमश: बिलासपुर, जांजगीर चांपा,कोरबा, रायगढ़, जशपुर, सरगुजा, कोरिया जिले हैं। बिलासपुर और बस्तर संभाग के अधिसंख्य जिले वनांचल हैं जहां आदिवासी निवास करते हैं। बिलासपुर संभाग में 130 विकासखंड हैं जिसमें से 25 आदिवासी विकासखंड हैं। इसी तरह बस्तर संभाग के 32 विकासखंडों में से 14 आदिवासी विकासखंड हैं। रायपुर संभाग में 49 विकासखंडों में से 7 आदिवासी विकासखंड हैं।

जनसंख्या
सन 2001 में हुई जनगणना के अनुसार छत्तीसगढ़ की जनसंख्या 20,795,956 है जिसमें पुरुषों की संख्या 10,452,426 और महिलाआें की संख्या 10,343,530 है। कुल जनसंख्या में से अनुसूचित जाति व जनजाति की संख्या 2148000है। राज्य कुल आबादी की 79.92 जनसंख्या गांवों में निवास करती है। जिसमें 8330000 महिला और 8291000 पुरूष हैं।

जनजातीय संस्कृति
जनजातीय संस्कृति छत्तीसगढ़ की पहचान है। यहां की कुल जनसंख्या का 35.77 प्रतिशत जनजातीय संस्कृति से संबंधित हैं। छत्तीसगढ़ में अनुसूचित जनजातियों की संख्या 21 है। जिसमें गोंड,बैगा,कोरबा,उरांव हल्वा,भतरा,कंवर,कमार,माड़िया,मुड़िया,ङैना, भारिया, बिंडवार, धनवार,नगेशिया मंढवार, खेरवार, भुंजिया, पारधी खरिया, गड़ाबा या गड़बा हैंं। इनकी कई उपजातियां भी हैं। छह अनुसूचित जनजातियों अबुझमाड़िया, बैगा, भारिया, बिरहोर, कमार, कोरवा, को आदिम जनजातियों का दर्जा प्राप्त है। इनमें से अबूझमाडिया, बैगा, कोरवा जाति की प्रमुखता है। गोंड जनसंख्या की दृष्टि से सबसे बड़ा आदिवासी समुदाय है। यह छत्तीसगढ़ के दक्षिणी पर्वतीय क्षेत्रों कांकेर, बस्तर, दंतेवाड़ा में निवास करती है। इनका प्रमुख व्यवसाय कृषिहै। ये शिकार तथा मजदूरी आदि में भी काफी रुचि रखते हैं। कोरबा जनजाति सरगुजा, रायगढ़, जशपुर,कोरिया बिलासपुर तथा जांजगीर जिलों में निवास करती है। पहाड़ों में रहने वाले कोरवा को पहाड़ी और मैदानों में पहने वाले कोरवा को दिहरिया कोरबा के नाम से जाना जाता है। येजमीन बदल-बदल कर खेती करते हैं। पहाड़ी कोरवा रूढ़िवादी और एकान्तप्रिय होते हैं। माड़िया बस्तर जिले में निवास करते हैं। इनकी उत्पत्ति प्रोटो आस्ट्रेलायड नृजाति प्रडजाति से हुई मानी जाती है। पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले माड़िया दुनिया की सभ्यता से पूर्णत: विलग हैं। इनमें से अनेक अबूझमाड़ की पहाड़ियों में रहते हैं अत: इन्हें अबूझमाड़िया कहा जाता है। ये मुख्यत: झूम खेती करते हैं इनकी स्थानांतरिक खेती को दिघा, पेंडा व दाही कहा जाता है। इनकी प्रमुख देवी भूमि माता है। मुड़िया जनजाति का निवास स्थान बस्तर क्षेत्र है। जमीन बदल-बदलकर खेती करना इनकी प्रमुख विशेषता है नृत्य गायन और मदिरा पान इनकी प्रमुख विशेषता है। इनकी सर्वाधिक मौलिक विशेषता घोटुल प्रथा है। गड़ाबा या गड़वा जनजाति मुंडारी या कोलेरियन समूह की जनजाति है। ये बस्तर, रायगढ़ और बिलासपुर जिले में निवासरत हैं। ये बोझा ढोकर तथा खेती द्वारा अपना जीवन यापन करते हैं। बैगा द्रविड़ समुदाय की जनजाति है। ये बिलासपुर और राजनांदगांव क्षेत्र में निवासरत हैं। ये लोग जंगलों को ईश्वर द्वारा बनाया गया आवश्यकता पूर्ति का साधन मानते हैं। खेती तथा वनोपज इनकी आजीविका का प्रमुख साधन है।

वन और खनिज
छत्तीसगढ़ में विपुल प्राकृतिक संसाधन मौजूद हैं। वन और खनिज संपदा से सम्पन्न है यह राज्य। राज्य का 59285.27 हेक्टेयर भू भाग वनों से आच्छादित है जो छत्तीसगढ़ प्रदेश के कुल भू क्षेत्रफल का 43.85 है। भारत का 70 फीसदी तेंदूपत्ता का उत्पादन छत्तीसगढ़ से होता है। खनिज समपदाओं में 16 प्रकार के खनिज यहां पाए जाते हैं। इनमें चूना पत्थर, तांबा, लौह अयस्क, मैंगनीज, कोरण्डम,डोलोमाइट, टिन अयस्क, बाक्साइट, अभ्रक, सोप स्टोन यूरेनियम गेरू प्रमुख हैं।

कृषि
छत्तीसगढ़ के निवासियों के मुख्य व्यवसाय खेती है। अखंडित मध्यप्रदेश के कुल कृषि उत्पादन का 24.1 हिस्सा छत्तीसगढ़ राज्य में सम्िमिलित है। चावल यहां की प्रमुख फसल है। साल भर में केवल एक ही फसल मिलती है। यहां के संपूर्ण क्षेत्र में चावल होने के कारण इसे धान का कटोरा कहा जाता है। यह राज्य 6 सौ चावल मिलों के कारखानों को धान की आपूर्ति करता है।

छिना जा रहा जीने का अधिकार
भारत के नक्शे पर खनिज संपदा और अमीर धरती के नाम से स्थान प्राप्त छत्तीसगढ़ के आविर्भाव के साथ ही राज्य में खासकर औद्योगिक निवेश की ओर उद्योगपतियों का रुख बढ़ा है बहुराष्ट्रीय कंपनियों की नजरें छत्तीसगढ़ की ओर लगी हुई हैं। खनिज और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के कई राष्ट्रीय कंपनियों ने अपनी परियोजनाएं प्रारंभ कर दी है। औद्योगिक विकास के नाम पर इन वनांचलों में स्थापित हो रहे संयंत्रों का इन आदिवासी क्षेत्रों में जोरदार विरोध हो रहा है पर आदिवासियों की जमीनें जो उनके भरण पोषण का एकमात्र साधन है उनसे छीना जा रहा है। संयंत्रों की स्थापना के कारण जंगल कट रहे हैं इससे भी इन आदिवासियों की आय जरिया खत्म होता जा रहा है। आदिवासियों के जल जंगल जमीन का संसाधन धीरे-धीरे छिनता जा रहा है। जिंदल द्वारा केलो नदी पर बनने वाली केलों विद्युत परियोजना का जोरदार विरोध वहां के आदिवासियों ने किया पर इसका अब तक सार्थक परिणाम सामने नहीं आया है। बहुराष्ट्रीय कंपनी रेडियस वाटर महानदी के बाद प्रदेश की सबसे बड़ी शिवनाथ नदी पर बांध बनाकर पानी बेच रही है। इसके लिए राज्य को करोड़ों का नुकसान हो रहा है पर राज्य सरकार इस पर ध्यान नहीं दे रही है। दुर्ग अंचल के किसानों को इसके पानी से वंचित होना पड़ रहा है। वे इसके पानी से खेती करते थे, यहां के लोगों के निस्तारी के लिए यह नदी एकमात्र थी जिस पर वे अवलंबित थे। औद्योगीकरण के कारण प्रदूषण बढ़ा है किसानों के खेत सीमेंट से पटने लगे हैं। कारखानों से उगलने वाला काला धुंआ खेत की खड़ी फसल को खराब करने लगा है। मजबूर किसानों को अपनी उपज बहुत ही कम कीमत में बेचने के लिए विवश होना पड़ रहा है। बीस हजार से ज्यादा देशी धान बीज के संग्रहण के लिए जाने जाने वाले इस राज्य के बीज बैंक को बहुराष्ट्रीय कंपनी सिजेंटा ने हथियाने की कोशिश की थी इससे साफ हो जाता है कि यह नवीन राज्य किस ओर अग्रसर होकर दुष्चक्र में फंसता जा रहा है। कोदो-कुटकी का उत्पादन आदिवासी करते हैं, उन्हें इसे बंद कर आधुनिक खेती अपनाने के लिए बाध्य किया जाता है। पर आज हर्बल स्टेट का दावा करने वाला छत्तीसगढ़ में कोदो को मूल्य राजधानी रायपुर में प्रतिकलो 40 रुपए है। यह कोदो मधुमेह के मरीजों का प्रमुख आहार है।
औद्योगिकीकरण के कारण आदिवासियों को विस्थापित होना पड़ रहा है। बांध बन रहे हैं गांव और जमीनें डूबत में आ रही है। लाभ शहरों को हो रहा है। उद्योग स्थापित हो रहे हैं जमीनें आदिवासियों से छीनी जा रही हैं। कभी सिलिंग एक्ट का हवाला देकर जमीदारों से उनकी जमीनी छीनी गई अब विकास के नाम पर उद्योग स्थापित करने के नाम पर जमीनें छीनकर इन उद्योगपतियों के हवाले की जा रही है। पहले सिलिंग एक्ट से निकाली गई जमीनें आदिवासियों भूमिहीनों और दलितों को आंबटित की गई पर आज इन्हीं आदिवासियों की जमीनें छीनकर उद्योगपितयों के हवाले की जा रही हैं। क्या यह जमींदारी प्रथा का नवीनीकरण नहीं है। एक छोटे से पर बहुचर्चित कोडार बांध परियोजना जिस तरह से भ्रष्टाचार हुआ और जिस तरह अब तक इससे प्रभावित किसानों को उनका मुआवजा तक नहीं मिल पाया है। यह स्वत: इस तथ्य को इंगित करता है कि यदि आदिवासी इलाके में ऐसी कोई परियोजना होगी तो भोलेभाले आदिवासियों के हिस्से क्या आएगा। गंगरेल और अन्य कई परियोजनाओं के विस्थापितों को उनका मुआवजा नहीं मिल पाया है। मिला भी है तो बहुत ही कम। आदिवासियों की जल जंगल जमीन पर कब्जा कर आदिवासियों के लिए विकास का तर्क देना उसके खोखलेपन को साबित करता है। जंगल के बिना आदिवासी अधूरा है पर अभयारण्य के नाम आदिवासियों को उन स्थलों से बदेखल किया जा रहा है जंगलों में स्थित ग्राम उजाड़े जा रहे हैं उन्हें अब वहां रहने का हक नहीं है अब वहां जंगली जानवर रहेंगे। विकास का हवाला देकर बस्तर में नगरनार स्टील संयंत्र की स्थापना की जा रही है पर इससे न जाने कितने आदिवासी परिवार बेदखल किए जा रहे हैं। संयंत्र स्थापना कर जंगल खत्म किया जा रहा है जिससे इन आदिवासियों के आजीविका का प्रमुख साधन वनोपज भी खत्म होता जा रहा है। नए राज्य के निर्माण से उम्मीद थी कि इन आदिवासियों की स्थिति में सुधार होगा पर दिनों दिन उनकी स्थिति बजतर होती दा रही है। आदिवासी भूखे मरने लगे हैं।
शासन और प्रशासन से मिलने वाली सुविधाओं का उन्हें लाभ नहीं मिल पा रहा है। राज्य सरकार भी इनके विकास के लिए कोई आधारभूत संरचना का निर्माण नहीं कर पाई है सरकार के नीतिगत फैसलों के लाभ इन्हें नहीं मिल पा रहा है। यही कारण है आए दिन वनांचलों से काम की तलाश में अन्य राज्यों को पलायन होता है। राज्य की अधिकांश जनता ग्रामीण है और उनके जीवन-यापन का साधन कृषि पर अवलंबित है। वे व्यक्ति जिनके दो-चार एकड़ जमीन है या फिर वे मजदूर जो खेतों में काम करने अपना गुजारा करती है रोजगार के अभाव में खासकर गर्मी के मौसम में छत्तीसगढ़ से अन्यत्र आंध्रप्रदेश, उत्तरप्रदेश, बिहार आदि चले जाते है और बारिश होने के पहले खेती के लिए वापस लौट आते हैं। वनांचलोें में शिक्षा की बेहतर व्यवस्था तो दूर प्रथमिक स्कूली शिक्षा ठीक ढंग से नहीं मिल पाती जिसके कारण आदिवासी शिक्षित होने से वंचित हो जाते है। स्वास्थ्य सुविधाएं भी न्यून रूप में है कई स्वास्थ केंद्र उनके निवास से कई किलोमीटर दूर होते हैं जहां वे पहुंच नहीं पाते। उन्हें प्राथमिक चिकित्सा का लाभ तक नहीं मिल पाता।
कुल मिलाकर देखें तो भूमंडलीकरण से छत्तीसगढ़ के आदिवासियों का कोई भला नहीं हुआ है। उल्टे विकास के नाम पर उनके जीने के साधन, संसाधन और सांस्कृतिक मान्यताओं पर निरंतर आघात होता जा रहा है। उनके जीने के अधिकार पर सीधे प्रहार हो रहा है। सिकुड़ते जल, जंगल और जमीन से आदिवासियों के समक्ष एक अस्तित्व का संकट उत्पन्न होता जा रहा है। पहाड़ी कोरवा जनजाति की निरंतर घटती जनसंख्या इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। आज जल, जंगल और जमीन से बेदखल हो रहे आदिवासियों की स्थितियों पर एक सर्वेक्षण कर उनके पुनर्वास और विकास के लिए आधारभूत संरचनागत नीति निर्माण की जरूरत है। इन आदिवासियों की मूल परंपरा, मान्यताओं, सांस्कृतिक विरासत को क्षति पहुंचाए बिना उनको किस तरह से विकास की धारा में शामिल किया जा सकता है उस पर गहन अध्ययन की जरूरत है।

तुम

9:31 AM, Posted by डा. निर्मल साहू, One Comment

शब्द में जैसे अर्थ हो तुम
गीतों में नाजुक बन्ध हो तुम
सरगम की इक-इक लय में
कविता हो कोई छंद हो तुम
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सुमन में सौंदर्य हो तुम
समीर में सौरभ हो तुम
सौन्दर्य में शचि हो तुम
पत्तियों में मुस्कराती शबनम हो तुम
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रूप हो तुम,रस हो तुम
गंध हो तुम, राग हो तुम
सांसों में जो नित-नित फिरता
प्राण बनी चेतना हो तुम
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सांसों की सरगम हो तुम
दिल की धड़कन हो तुम
पंचम स्वर में जो नित बोले
गीत वही संगीत हो तुम
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अधरों की तपन हो तुम
सीने की जलन हो तुम
इन्द्रधनुषी रंग लिए
बहकी -बहकी ख्वाब हो तुम
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रजनी की राका हो तुम
सूरज की रश्मि हो तुम
रिमझिम मीठी फुहार हो तुम
ठंड गुलाबी मधुमास हो तुम
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कली सी नाजुक हो तुम
कलगी की लचक हो तुम
हर शब्दों में आहट देती
कवि की चरम कल्पना हो तुम
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गरम हो तुम ,शीतल हो तुम
कोमल हो तुम , कठोर हो तुम
नरम हो तुम मंजुल हो तुम
प्रकृति की प्रतिकृति हो तुम
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मतवाले की मधुशाला हो तुम
जम पिलाती मधुबाला हो तुम
हर इक प्याले में छलकती
कड़वी-मीठी शराब हो तुम
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इच्छा हो, अभिलाषा हो तुम
जीवन की परिभाषा हो तुम
आसों में सांसे भारती
मन की सारी शक्ति हो तुम
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कलकल-छलछल सरिता हो तुम
पायल की रुनझुन मादकता हो तुम
मधुमय मंद झकोर हो तुम
स्वपन्मयी हिलोर हो तुम
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वामन का विपुल विस्तार हो तुम
विश्व का नवल श्रृंगार हो तुम
मौन होकर भी मुखर हो तुम
प्रथम स्पर्श प्यार हो तुम
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एक अधूरी मुस्कान हो तुम
रहस्यमयी वरदान हो तुम
प्रगतिमय सोपान हो तुम
भूत, भविष्य,वर्त्तमान हो तुम
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पल हो, प्रतिपल,अनुपल हो तुम
दिवस, रात्रि, संध्या प्रभात हो तुम
विजय स्वर प्रत्येक क्षणों में
इतिहास रचती युग गाथा हो तुम
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समीर का मृदुल मंद हास हो तुम
शरद का शशि विलास हो तुम
बसंत का परिहास हो तुम
परिवर्तनों में समाहित पूर्णता हो तुम
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चपल अबोध बचपन में तुम
ताप-तप्त उग्र यौवन में तुम
शांत गंभीर अन्तकाल में तुम
बद्ध होकर मुक्त हो तुम
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प्रबल झंझा पवन हो तुम
शांत विस्तारित गगन हो तुम
मन के सूने आंगन में
मधुमासी विश्वास हो तुम
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कच्ची फसल की गमक हो तुम
माटी की सोंधी महक हो तुम
संभावनाओं को समेटे
सृस्ती की चरम अव्भियक्ति हो तुम
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दुखितों का विश्वास हो तुम
प्यास में जैसे नीर हो तुम
पथ हो, पाथेय भी हो
मील का पत्थर संबल हो तुम
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श्रेय हो तुम,प्रेय हो तुम
शिक्षा हो तुम ,ज्ञान हो तुम
योगी की साधना हो तुम
सत्यं, शिवम्, सुन्दरम हो तुम
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तृष्णा हो तुम, तृप्ति हो तुम
उत्साह हो तुम, नैराश्य हो तुम
क्षितिज समेटे आँचल में
छलनामय बंधन हो तुम
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अमित युगों का संचित पुण्य हो तुम
शिव की कलिका शक्ति -पुंज हो तुम
प्रत्येक गृहों में रूप अन्नपुर्णा
दया, दृष्टि, क्षमा हो तुम
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सन्देश अमर गीता हो तुम
विश्वास प्रखर कुरान हो तुम
प्रेम अमित बाइबिल हो तुम
त्याग अपरिमित गुरुग्रंथ हो तुम
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पतित पाविनी गंगा हो तुम
सृजन्मयी मेधा हो तुम
उर्वर हो मरू भी तुम से
ऐसी अक्षय उर्जा हो तुम
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पूजा हो तुम,भक्ति हो तुम
श्रद्धा हो,समर्पण हो तुम
सफलता और सार्थकता में तुम
प्रार्थना के गीत हो तुम
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मां हो तुम, देवी हो तुम
प्रिय, प्रियतमा, पत्नी हो तुम
सखी,सहेली, बहन हो तुम
नाम नहीं,सर्वनाम हो तुम
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6:07 PM, Posted by डा. निर्मल साहू, No Comment




सिरीमान गांधी बबा,
पांव परथों
मनके मैं अलकरहा वल्द टपरहा, जाति-भट्टी, धरम-ठर्रा, मुकाम- रजबंधा, रायपुर छत्तीसगढ़ के रहैय्या हावौं। एदे की आज तोला सबो सुरता कर हावंय तै पाय के मंय घलो एक अध्दी आसूं बोहावत तोला कोरी-कोरी परनाम करत हावौं।
हमर बड़ बाग रहिस की तोर असन बबा पायन, हामर देश मां तोर लाठी चश्मा अप लिंगोटी के डर मा गोरा मन गट्टी ला खाली कर दीन। तोर बताय रद्दा ला हमन देखत हावन अउ नवा तरीका ले चलेके कोसिस करत हवन। तोर सपना रिहिस की गांव-गांव मं गोरस के नदी बोहावे फेर आज हमन देखेन की एला पी के सबो बीमार परत हवैं, दूध के धंदा ला सबो गारी देवत हवैं। पानी नई मिलाय ले घलो पानी मिलाथस कहिके चाबे कस गोठियाथें तै पायके हमन गांव-गांव के गली-गली मं दारू के नरुवा बहावत के सोचे हवन। देस के सबो हालचाल ला देखके मंय एकरे खातिर देसी शारबा भट्ठी के ठेका लेवत हावौं। तोर किरपा रही, तो संझाहा अऊ रतिहा बाड़ही।
बुरा मत सुनो, बुरा मत देखो, बुरा मत कहो, तोर बेंदरा मन के ये वचन ला मन मं कभू नई बुलावौं। परानजाय फेर बचना न जाय कस धरे हावाैंं।
पर साल ठेका मं बनेच पाइयदा होइस ठार्रा ला पीके बनेच मन अंधवा, भैइरा अउ कोंदा होगिन। तोर बेंदरा के वचना मन ला मोर भट्ठी ह पूरा कर दीस। सरकार के परिवार नियोजन पोरग्राम मंय पूरा कर देंव। एकर सेती मोला आसीर्वाद दे ददा कि अवैया साल मं चार ठन भट्टी के ठो मिलेव।
तोर कहना रहिस मनखे ला सदा सत कहना चाही। झूठ बचना नई बोलना चाही। बबा, दारू ला पीके मनखे झूठ नई गोठियाता तोर सिध्दांत के मंय पक्का चलवैया हावौं, ऐकरे खातिर मंय अपन धंधा मं एकर अब्बड़ धियान राखत हावौं।
गांधी बबा, तोर बेंदारा के नवा चेला मन कभू-कभू मोला अब्बड़ परेसान करथें। फेर दू-चार अध्दी मसाला दे देंथंव तो पी खा के सुत जाथें। ओ मन बाुर नई देखें, नई सुने और नइ केहें। तोर टोपी अऊ खादी ला पहिन के कथे बेटा अलकरहा टोपी के मतलब आय टोंटी (घेंच) के आवत तक ले पी । धन्य मोर बड़े बाप तोर दुनिया देखे के चश्मा बड़ अकन हावय।
बबा तंय गोली खाके मजा ले सरग में गोड़ रगड़ावत होबे। मंय इहां तोर चेला मन के रोज गाली खावत तीनों बेंदरा के गोड़ मन मं नाक रगड़त हावौं।
तोर अंधवा बेंदरा ह पुलिस बनगे, मारपीट, दंगा पसाद चोरी ये सब ला नई देख सके। तोर भैंइरा बेंदरा ह अफसर होगे। मनखे भूख ले मरगे,टेटकू के टूरी ला गुंडा मन उठा के लेगीन। भट्टठी मं आइस त कथे मंय बुरा चीज देख सकथों और कहे सकथों फेर सुने नई सकौं। साले दारू में पानी मिलाते हो, महुआ वाला निकाल। चार ठन बोतल गठागठ ढार दीस अउ जब मातगे त कथे- कका अलकरहा , अइसनअपन भतीजा मन के धियान रखे रबे तो कोनो माइ के लाल परेसान नई कर सके।
तोर कोंदा बेंदरा ह आजकल मंतरी होगे हे। दिन रात ये कुर्सी ले उ कुर्सी नाचत फुड़ी खेलत रथे। कभू कराब गोठ नई गोठियावे। एख दिन कथे अबे टपरहा के औलाद अकेत नरियाथाें फेर कइसने कोनों ला फरक नई पड़े रे। तोर ये बंदेरा हा महुआ के ला नई पिये अंगूर के ला मंगाथे। छेरी के गोरस नई पिये छेरी ला का जाथे।
जै गांधी बबा, तोर बंदरा अऊ चेला मन के कारोबार अब्बड़ जोर ले चलत हावय। मोला घेरी-बेरी अलकरहा ददा, कका, बबा कहत रहिथें।
ऐ बबा सुन ले, तोर जमाना मं टूरा मन तोर ले सीख के तोर बर अपन घर-बार, डौकी -लइका जमीन जायददा सबो ला छोड़ देवें। ये परंपरा ला मंय राखे हांववव। मोर बट्टी मं आके सबो एके परानी हो जाथें। मोला आशीस दे बबा कि मोला घलो टाटा कस भारत रतन मिल जाए। मंय तोर कोरी-कोरी बंदना कत हांवव। भारत रतन मिल जाही त मं देस के घरोघर में दारू बनाए के कारखाना कोल दिहूं जेकर ले कोनो बाुर मत देखे, मत सुने अउ मत कहे।
बबा एदे मोर कान मं बात आवत हे कि मोर भट्टी ला टारे जाही। सरपंच ह गांव के कतको लोग मन के संग आए रहिस के ऐ भट्टी ह अवैध आय। गांव मं दंगा फसाद एकरे सेती होवत हे। अपन भट्टी के कसम खावक कहिथों बबा कि ये सरंपच हर लबरा आय। कतक दिन तक ऐला फोकट में दारू देतें। एक दिन तनातनी होगे ते बस ये खेल होगे। गांव के लइका पिटका महतारी मन ला धरके दिन भर नरियावत रहिस भट्टी हाटाओ, गांव बचाओ।
ऐकर फिकर वैइसे मोला नइये काबर पटवारी पेटूराम ह कहिस हे अरे बेफिकर र। मोर कलम के ताकत ले कोनो पार नई पांय हें। कलेक्टर करा घलो मोर कलम के काट नई ये। जानत तो हावस बेटा मोला का चाही- दू रोटी दू बोटी थोरकुन गंगाजल। सबो बुता एकरे बाद भकाभक निपट जाथे। ये बेंदरा मन के लइका पिचका मन ला घलो दू रोटी दू बोटी अउ थाकुन गंगाजल दे देबे अउ फेर ऐस कर।
अऊ कतक गोठियाबों बबा,तोर सुते के टैम होगे होही। मोर अरजी ला पढ़ लेबे बबा । सबो सत-सत गोठियाय हावौं। लबारी मारे होहूं त मोर ठेका ले खारिज करवा देबे। ठर्रा, मसाला ला छू के कसम खावत हावौं तोर बेंदरा मन ला कोनो किसिम के तकलीफ होय नही गों। तोर हर बरसी मं मसाला, ठर्रा फोकट में बांटथों अऊ बांटते रहिहों।

-तोरेच चेला
अलकरहा ठर्रावाला
रजबंधा
तारीख 2 अक्टूबर
दिन- सनडे